अध्यात्म, साहित्य और प्रेक्षाध्यान के अमर प्रणेता आचार्य महाप्रज्ञ जी का १०७वां जन्म दिवस

लाडनूं। 12 जुलाई, 2026
जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्म संघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की मंगल सन्निधि में तेरापंथ धर्म संघ के दसवें अधिशास्ता, प्रेक्षा प्रणेता आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी का १०७वां जन्म दिवस आध्यात्मिक रूप में समायोजित हुआ।
शारीरिक, मानसिक और भावात्मक स्वास्थ्य का महत्त्व : प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में आचार्यप्रवर ने ‘प्रज्ञा से समीक्षा करें’ विषय पर पावन देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि–
१. आदमी का शरीर पुष्ट, शक्तिशाली और स्वस्थ हो तो वह अनुकूलता से कार्य, परिश्रम, यात्रा और प्रवचन कर सकता है। शरीर की ऐसी अनुकूलता रहनी चाहिए कि कम से कम डॉक्टर और दवाइयों की आवश्यकता पड़े।
२. शारीरिक स्वास्थ्य के साथ जीवन में मानसिक स्वास्थ्य का भी बड़ा महत्त्व है, जिससे मन में शांति व समाधि रहे तथा भय, चिंता व क्रोध के कारण जीवन में उथल-पुथल की स्थिति पैदा न हो।
३. मानसिक स्वास्थ्य से भी आगे भावात्मक स्वास्थ्य का महत्त्व है। हमारे भीतर घृणा व नफरत के भाव न हों और अध्यवसाय पूरी तरह शुद्ध रहें।
४. हमारे भाव जगत का मूल कारण कार्मण शरीर है। कर्मों के अनुरूप ही भाव व अध्यवसाय होते हैं और उनका सीधा असर हमारे मन व शरीर पर पड़ता है।
ज्ञान के दो रूप : कुएं और कुंड का पानी : आचार्यश्री ने ज्ञान प्राप्ति के पुरुषार्थ को सुंदर उदाहरण से समझाते हुए फरमाया कि–
१. रटकर व पढ़कर प्राप्त किया गया ज्ञान 'कुंड के पानी' जैसा है, जिसमें उतना ही जल रहता है जितना बाहर से डाला जाता है।
२. इसके विपरीत, अवधि ज्ञान, मनःपर्यव ज्ञान और मति-श्रुत ज्ञान 'कुएं के पानी' के समान है, जिसमें भीतर से स्वतः ज्ञान का निरंतर प्रवाह आता रहता है।
३. आचार्य महाप्रज्ञ जी ने बालमुनि की अवस्था में आचार्य तुलसी के सान्निध्य में कड़ा श्रम करके संस्कृत व हिंदी दोनों भाषाओं का असाधारण वैदुष्य हासिल किया था।
साहित्य संपदा, आगम संपादन और प्रेक्षाध्यान का अवदान : गुरुदेव के महान कार्यों को रेखांकित करते हुए आचार्यप्रवर ने फरमाया कि-
१. आचार्य महाप्रज्ञ जी की संस्कृत आशु श्लोक रचना और उनकी महान ग्रंथ रचना 'जैन दर्शन: मनन और मीमांसा' उनके अद्वितीय ज्ञान का 
जीवंत प्रमाण हैं।
२. आचार्य तुलसी के तत्वावधान में आगम संपादन और प्रेक्षाध्यान के विकास में उन्होंने अपने श्रम व समय का जो नियोजन किया, उसी के कारण आज प्रेक्षाध्यान की पहुंच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है।
३. समण श्रेणी का विकास और ज्ञानवर्धन का सशक्त माध्यम बनी 'महाप्रज्ञ श्रुताराधना' पाठ्यक्रम धर्मसंघ को उनका बहुत बड़ा अवदान है।
आचार्यश्री के प्रवचन के उपरान्त साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुत विभा जी ने श्रद्धाभिव्यक्ति देते हुए फरमाया कि–
१.आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी का आहार का कठोर संयम।
२.अपने आवेश और क्रोध पर उनका पूर्ण नियंत्रण।
३.उनके मस्तिष्क की निरंतर सक्रियता। इन्हीं तीन कारणों से वे ९०वें दशक में भी शरीर, मन और वाणी से पूरी तरह स्वस्थ व सक्रिय थे।
शपथ ग्रहण एवं अन्य कार्यक्रम: सभा में विभिन्न आध्यात्मिक उपक्रम भी संपन्न हुए।
१. जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमर चंद लुंकड़ ने अपनी श्रद्धापूर्ण अभिव्यक्ति दी।
२. मुनि राजकुमार जी ने आचार्यप्रवर से आठ की तपस्या का प्रत्याख्यान ग्रहण किया।
३. छठे प्रेक्षा इंटरनेशनल कन्वेंशन में नवनिर्वाचित अध्यक्ष संपतलाल नाहटा को निवर्तमान अध्यक्ष अरविंद संचेती ने शपथ दिलाई, जिस पर आचार्यश्री ने नई टीम को पावन मंगल पाठ सुनाया