सुधर्मा सभा में पूज्य प्रवर ने परमात्मा, महात्मा, सदात्मा और दुरात्मा के भेद को किया स्पष्ट; गुरु की कठोर उलाहना को भी समता से सहने की दी प्रेरणा

लाडनूं। 02 जुलाई, 2026
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में चतुर्विध धर्मसंघ को ’’महान ऋषियों का करें अनुकरण’’ विषय पर पावन संबोध प्रदान किया। 
आचार्यप्रवर ने फरमाया कि संसार में मनुष्य रूप में जन्म लेने वाली आत्माओं को चार भागों में बाँटा जा सकता है—परमात्मा, महात्मा, सदात्मा और दुरात्मा। चार प्रकार की आत्माओं का भेद स्पष्ट करते हुए गुरुदेव ने फरमाया।
१. परमात्मा : जो आत्मा परम अवस्था को प्राप्त हो गई है, जैसे सिद्ध भगवान, वे परमात्मा हैं। सिद्ध भगवंतों में सर्वोच्च निर्मलता होती है। वहाँ जन्म-मरण, रोग-शोक, व्याधि, राग-द्वेष कुछ नहीं होता, वे शुद्ध ज्योतिर्मय और आठों कर्मों से मुक्त हैं। केवल ज्ञानी व तीर्थंकर अवस्था को भी एक सीमा तक परमात्मा माना जा सकता है।
२. महात्मा : जो संत, ऋषि और साधक निर्ग्रन्थता को प्राप्त हैं। सामान्य भाषा में, जिनके जो मन में है, वही वाणी और आचरण में होता है।
३. सदात्मा : लोगों के लिए महात्मा या साधु बनना मुश्किल है, वे सदात्मा अर्थात सज्जन आदमी बन सकते हैं। 
४. दुरात्मा : इसके विपरीत जिनके मन, वाणी और आचरण में अंतर होता है तथा जो हिंसा, हत्या, लूटपाट, चोरी आदि पाप करते हैं, वे दुरात्मा हैं।
महात्मा न बन पाने वाले जीवों के लिए 'सदात्मा' (सज्जन) की ३ पहचान:
यदि किसी के लिए महात्मा बनना मुश्किल है, तो वह सदात्मा अर्थात सज्जन आदमी बन सकता है जिसकी ३ पहचान हैं।
१. विद्या का उपयोग : दुर्जन विद्या का प्रयोग विवाद के लिए करता है, जबकि सज्जन इसे ज्ञान मानकर दूसरों में बाँटता है।
२. धन का सदुपयोग : दुर्जन धन का अहंकार करता है, जबकि सज्जन व्यक्ति दान करता है और उत्कृष्ट भावना से संतों को गोचरी बहराता है।
३. शक्ति का उद्देश्य : दुर्जन अपनी शक्ति का दुरुपयोग दूसरों को सताने में करता है, जबकि सज्जन शक्ति का उपयोग दूसरों की रक्षा में करता है।
साधु से भूल हो तो समय रहते संभलना जरूरी : आचार्य भिक्षु का आचरण ही आदर्श
आगम के आलोक में शांतिदूत ने फरमाया कि महान यशस्वी ऋषियों द्वारा किया गया श्रेष्ठ आचरण ही वास्तविक मार्ग है। आचरण सामान्य आदमी भी करता है, पर ऋषियों का आचरण आदर्श होता है। साधु से गलती भी हो सकती है, पर समय रहते यदि वह संभल जाए तो अच्छी बात है। गुरुदेव ने आद्य प्रवर्तक आचार्य श्री भिक्षु का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने जीवन में घोर परीषहों और प्रतिकूल परिस्थितियों को समता से सहन किया, उनका आचरण ही हमारा आदर्श है।
सच्चे साधक के लिए विवेक और सहिष्णुता के नियम–
१. विविक्त स्थान का सेवन : जीवों की रक्षा करने वाले साधु को हमेशा एकांत और विविक्त स्थानों का सेवन करना चाहिए, जहाँ पशुओं या भिन्न लिंगियों का वास न हो।
२. कष्टों में समभाव : मार्ग के शारीरिक कष्टों, ऊबड़-खाबड़ रास्तों और किसी के भी कठोर वचनों को समता से सहें। भाषा में भीतर की भावना का ज्यादा महत्व होता है, अतः कोई आक्रोश में भी बोले तो सहन करें।
३. गुरु की उलाहना का आदर : कई बार गुरु से कठोर उलाहना भी मिल जाए तो उसे भी सहन करें, अपनी भूल का परिष्कार करें और भीतर सहिष्णुता का विकास करें।