श्वास के साथ 'लोगस्स' ध्यान और कायोत्सर्ग के ५ महा-लाभों का किया विस्तृत विवेचन
लाडनूं। 20 अगस्त, 2026
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, नेमानंदन, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती परिसर में ‘कायोत्सर्ग से क्या मिलेगा?’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से पावन देशना प्रदान की।
कायोत्सर्ग का मर्म और इसके तीन मुख्य आयाम:
१. काय + उत्सर्ग : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि कायोत्सर्ग शब्द 'काय' (शरीर) और 'उत्सर्ग' (त्याग) के योग से बना है। इसका अर्थ केवल शरीर को छोड़ना नहीं, बल्कि शरीर की चंचलता का त्याग करना है।
२. तीन प्रमुख आयाम: कायोत्सर्ग के तीन रूप हैं—
I. शरीर की चंचलता का विसर्जन करना।
II. शरीर के प्रति आसक्ति व ममत्व का परित्याग करना।
III. शरीर में व्याप्त खिंचाव व तनाव का विसर्जन कर उसे पूर्णतः शिथिल बना देना।
प्रेक्षाध्यान की विधि और 'लोगस्स' का ध्यान :
१. स्थिरता, शिथिलता और जागरूकता : प्रेक्षाध्यान साधना पद्धति में कायोत्सर्ग के दो रूप हैं—लंबा कायोत्सर्ग (४०-४५ मिनट) और छोटा कायोत्सर्ग। ध्यान का मूल आधार शरीर की पूर्ण स्थिरता, शिथिलता और सजगता है।
२. श्वास के साथ ध्यान : आचार्यश्री ने उपस्थित विशाल चतुर्विध धर्मसंघ को श्वास के साथ 'लोगस्स' के ध्यान का प्रयोग भी करवाया, जिससे उपस्थित श्रद्धालुओं ने आत्म-शांति का अनुभव किया।
कायोत्सर्ग से प्राप्त होने वाले ५ महा-लाभ:
१. जड़ता की शुद्धि : कायोत्सर्ग करने से शरीर व मन की जड़ता समाप्त होती है।
२. निर्मल मति : बुद्धि तीक्ष्ण, स्पष्ट और निर्मल बनती है।
३. समता भाव का विकास : अनुकूल और प्रतिकूल, सुख और दुख—दोनों स्थितियों को समता से सहने की क्षमता विकसित होती है।
४. उत्कृष्ट अनुप्रेक्षा : अनुप्रेक्षा (चिंतन-मनन) की साधना अधिक प्रभावी और गहरी होती है।
५. गहन ध्यान की सिद्धि : शरीर के स्थिर और शिथिल होने से ध्यान का प्रयोग अत्यंत सुगम और फलदायी हो जाता है।
अतीत के दोषों का परिमार्जन और प्रशांत विहार :
१. प्रायश्चित्त व दोष विशुद्धि : आगम के अनुसार, कायोत्सर्ग से अतीत और वर्तमान के प्रायश्चित्त योग्य दोषों की विशुद्धि होती है।
२. हल्कापन और सुखमय जीवन : दोषों के क्षय से साधु प्रशस्त ध्यान वाला और आत्म-भार से मुक्त (हल्का) हो जाता है। वह संयम पथ पर 'सुखे-सुखे' (आनंदपूर्वक) विहार करता है। आचार्यश्री ने सभी को कायोत्सर्ग के माध्यम से अपनी साधना को सुदृढ़ बनाने की पावन प्रेरणा दी।