भिक्षु चेतना वर्ष' के द्वितीय दिवस पर 'आचार्य भिक्षु का साहित्य संसार' विषय पर अमृत देशना—'ज्ञान के बिना साहित्य में गांभीर्य नहीं आता

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता स्वामी भिक्षु के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष (भिक्षु चेतना वर्ष) के त्रिदिवसीय समापन समारोह के दूसरे दिन का गरिमामय शुभारंभ वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। साध्वीवृंद ने 'प्रज्ञागीत' का संगान किया।
मोक्ष का मार्ग और राग-द्वेष का 
क्षय : सर्वज्ञता का प्रकाश–
पूज्य आचार्यश्री ने 'एकांत सुख वाला मोक्ष कौन पा सकता है?' प्रश्न का समाधान देते हुए फरमाया कि जिसके राग और द्वेष पूरी तरह क्षीण हो जाते हैं, उसका अज्ञान दूर हो जाता है। राग-द्वेष के मिटते ही आत्मा में सर्वज्ञता और परम ज्ञान का प्रकाश फैलता है।
आचार्य भिक्षु का अगाध साहित्य संसार–
१. ज्ञान और साहित्य का संबंध : आचार्यश्री ने फरमाया कि बिना गहरे ज्ञान के साहित्य में गंभीरता नहीं आ सकती। जिससे दिशा और मार्गदर्शन मिले, वही उत्तम ग्रंथ है।
२. राजस्थानी भाषा का विराट साहित्य : स्वामी भिक्षु और श्रीमद् जयाचार्य महान साहित्यकार थे। पिछले ५ शताब्दियों में राजस्थानी भाषा में पद्य परिमाण साहित्य की जितनी विशाल रचना जयाचार्य और स्वामी भिक्षु ने की, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है। स्वामी जी ने आचार, तत्त्वज्ञान और आख्यान साहित्य की अविरल सरिता प्रवाहित की।
३. प्रमुख रचनाएं और 'भिक्षु वाणी' : आचार्यश्री ने स्वामी जी की प्रसिद्ध रचनाओं—'आचार की चौपई', 'बारह व्रत', 'इन्द्रिय वाढ़ी' व 'कालवाढ़ी' का उल्लेख करते हुए कहा कि लाडनूं का साहित्य भंडार अद्वितीय है। 'भिक्षु वाणी' ग्रंथ का स्वाध्याय और उसे कंठस्थ करने का प्रयास हर साधक को करना चाहिए। मुख्यमुनिश्री महावीरकुमार जी ने  कहा कि परम पूज्य आचार्यश्री भिक्षु ने अपनी बातों को इतने तार्किक और वैज्ञानिक ढंग से लिखा कि आज का आधुनिक व तार्किक मानव भी उस श्रद्धा के युग में लिखे गए साहित्य को पढ़कर नतमस्तक हो जाता है। उन्होंने अपनी अपूर्व प्रज्ञा और बुद्धि-कौशल से भगवान महावीर की वाणी के गूढ़ रहस्यों को अत्यंत सुंदर और सरल रूप में प्रस्तुत करके पूरे मानव समाज पर महान उपकार किया है।
साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी का वक्तव्य–
साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभा जी ने कहा कि आचार्य भिक्षु की अटूट आस्था के केंद्र केवल आगम थे। उनके चिंतन, दर्शन, व्यवहार और दैनिक जीवन में सदैव जिनवाणी के स्वर मुखर होते रहते थे। आचार्य भिक्षु एक क्रांतिकारी आचार्य थे, जिन्होंने उस दौर की रूढ़ मान्यताओं, अंधविश्वासों और मिथ्या अवधारणाओं के विरुद्ध निर्भीकता से सत्य को जनता के सामने रखा
२२वां राष्ट्रीय कन्या मंडल अधिवेशन– समारोह व संगान:आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल के तत्वावधान में २२वें राष्ट्रीय कन्या मंडल अधिवेशन का मंचीय उपक्रम आयोजित हुआ। इसमें अभातेममं की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुमन नाहटा एवं तेरापंथ कन्या मंडल ने अपनी प्रभावक प्रस्तुति दी।