पूज्य आचार्यश्री ने मुमुक्षु जहान व मुमुक्षु दिव्या की दीक्षा तिथि (१८ जनवरी २०२७) की घोषणा कर संघ को किया विभोर

लाडनूं। 30 अगस्त, 2026
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, जन-जन की आस्था के केंद्र, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की मंगल सन्निधि में सुधर्मा सभा में अत्यंत गौरवमयी, भक्तिमय और ऐतिहासिक रहा। एक ओर जहाँ ज्ञानशाला दिवस के अवसर पर बच्चों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों और दीक्षा की मंगल घोषणाओं से चतुर्विध धर्मसंघ भाव-विभोर हो उठा, वहीं पूज्य प्रवर ने अपने पावन प्रवचन में ‘परिवर्तना से क्या मिलेगा’ विषय पर आगमिक मार्गदर्शन प्रदान किया।
कंठस्थ ज्ञान की महिमा और 'परिवर्तना' (चितारने) का महत्व :
१. ​कंठस्थ ज्ञान गृहस्थ के धन समान: पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि ज्ञान को कंठस्थ करना भी एक प्रकार की साधना व तपस्या है। जो ज्ञान याद हो जाता है, वह साधक की अपनी अमूल्य संपत्ति बन जाता है। जिस प्रकार गृहस्थ जेब में रखे धन का उपयोग बाज़ार में तुरंत कर सकता है, उसी प्रकार कंठस्थ ज्ञान का उपयोग साधु विहार व प्रवचनों में बिना किसी पुस्तक या डायरी के, घंटों धाराप्रवाह व्याख्यान देकर जन-कल्याण हेतु कर सकता है।
२. ​परिवर्तना से व्यंजन लब्धि और स्मृति की पुष्टि : याद किए गए ज्ञान की देखभाल और रखरखाव का सही तरीका है— 'परिवर्तना' (पुनरावृत्ति या चितारना)। शास्त्रों के अनुसार, परिवर्तना से व्यंजन लब्धि उत्पन्न होती है। 
इससे भूला हुआ ज्ञान पुनः याद आ जाता है और स्मृतिगत ज्ञान और अधिक पुष्ट व सुदृढ़ बनता है।
३. ​शीतकालीन ५०० गाथा चितारने का संकल्प : आचार्यश्री ने प्रेरणा दी कि मंडली रूप में बैठकर चितारना और भी उपयोगी होता है। प्रवचन के अंत में पूज्य प्रवर ने साधु-साध्वियों, समणियों तथा मुमुक्षुओं को शीतकाल के चार महीनों (मार्गशीर्ष से फाल्गुन) में प्रतिदिन ५०० गाथाएँ चितारने का पावन संकल्प ग्रहण कराया।
दो मुमुक्षुओं की दीक्षा की मंगल घोषणा से गूँजा पांडाल :
१. दीक्षा की पावन तिथि: मंगल प्रवचन के उपरांत मुमुक्षु जहान बेताला एवं मुमुक्षु दिव्या ने आचार्यश्री के चरणों में संयम पथ पर बढ़ने हेतु दीक्षा की प्रार्थना की।
२. ​१८ जनवरी २०२७ का ऐतिहासिक दिन : पूज्य आचार्यश्री ने दोनों मुमुक्षुओं को पौष शुक्ला दशमी, वि.सं. २०८३ (१८ जनवरी २०२७) को जैन विश्व भारती प्रांगण, लाडनूं में मुनि/साध्वी दीक्षा प्रदान करने की पावन घोषणा की। इस घोषणा के होते ही संपूर्ण प्रवचन पांडाल जयघोष से गूँज उठा। मुमुक्षु जहान के पिता प्रवीण बेताला ने भी इस अवसर पर अपनी भावुक अभिव्यक्ति दी।
ज्ञानशाला दिवस : संस्कार निर्माण और डिजिटल युग में संतुलन :
१. ​ज्ञानार्थियों की प्रस्तुतियाँ व विचार : ज्ञानशाला दिवस के उपलक्ष्य में लाडनूं, राजलदेसर, छापर, बीदासर, छोटी खाटू व कालू ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने सुंदर प्रस्तुतियाँ दीं। कार्यक्रम में योगक्षेम प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री प्रमोद बैद एवं सुजानगढ़ ज्ञानशाला के संयोजक श्री संजय बोथरा ने अपने विचार व्यक्त किए।
२. ​मोबाइल और आध्यात्मिकता का संतुलन : आचार्यश्री ने आशीर्वाद प्रदान करते हुए फरमाया कि भाद्रपद के प्रथम रविवार को आयोजित होने वाली ज्ञानशाला बच्चों में संस्कार निर्माण का सशक्त माध्यम है। आज के डिजिटल युग में बच्चों में मोबाइल, तकनीक और सोशल मीडिया के साथ-साथ आध्यात्मिकता का संतुलन होना परम आवश्यक है। केवल भौतिकता से समाज में अनेक समस्याएँ पैदा हो सकती हैं, जबकि ज्ञानशाला से बच्चों का नैतिक व आध्यात्मिक विकास होता है।