आचार्यश्री की अमृत देशना—उम्र बढ़ने के साथ इच्छाओं की लिस्ट छोटी करना और सरलता अपनाना ही सच्ची साधना है

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक अहिंसा यात्रा प्रणेता महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने निर्धारित विषय ‘पद्म की तरह अलिप्त रहें’ को उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए फरमाया कि दूसरों के कल्याण के लिए उपदेश देना बड़ी बात होती है। लोगों के विमोक्ष के लिए अध्यात्म का मार्ग यदि कोई साधु बताता है तो वह बहुत अच्छा काम होता है।
संसार का व्यवहार और साधु जीवन का अंतर–
१. व्यावहारिक सहयोग : व्यापारी से वस्तु, चिकित्सक से चिकित्सा, शिक्षक से शिक्षा, वकील से न्यायिक परामर्श, इंजीनियर से निर्माण व सी.ए. से ऑडिट आदि के रूप में सहयोग मिलता है तो बदले में अर्थ (धन) के रूप में सहयोग मिलता है। इस प्रकार व्यवहार में जीवन चलता है।
२. साधु का आध्यात्मिक सहयोग : साधु धर्म का उपदेश देकर, किसी को धार्मिक-आध्यात्मिक त्याग कराकर, तपस्वी को दर्शन देकर, तपस्या का प्रत्याख्यान कराकर, वृद्ध को दर्शन व मंगल पाठ सुनाकर लोगों को सहयोग प्रदान करते हैं।
मुनि जयघोष का प्रसंग और 
अलिप्तता का संदेश–
१. मुनि जयघोष की घटना : मुनि जयघोष गोचरी के लिए गए थे, लेकिन उन्हें भिक्षा के लिए निषेध हो गया। मनाही होने पर भी उन्होंने उपदेश देते हुए कहा कि जैसे पद्म जल में पैदा होने पर भी जल से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार जो कामों और विषयों में अलिप्त रहता है, वही 'ब्राह्मण-माहन' कहलाता है।
२. अपरिग्रह महाव्रत : यह साधु की अनासक्ति और अपरिग्रह की साधना है। साधु का पांचवां महाव्रत अपरिग्रह महाव्रत होता है, उसे रुपये-पैसे, जमीन आदि के लेन-देन से दूर रहना चाहिए।
गृहस्थों और श्रावकों के लिए पावन दिशा-निर्देश–
१. इच्छाओं का परिसीमन : गृहस्थ को जैसे-जैसे अवसर आए परिग्रह का अल्पीकरण करना चाहिए। उम्र के साथ अपनी इच्छाओं का परिसीमन करे तथा भोग और उपभोग में संयम रखे।
२. अतिथि संविभाग व्रत : श्रावक का १२वां व्रत 'अतिथि संविभाग व्रत' है, अतः शुद्ध साधु को शुद्ध दान की भावना रखे। इन व्रतों के प्रभाव से आत्मा का उत्थान होता है।
३. सामायिक और पौषध : प्रतिदिन एक सामायिक और पौषध संयम की साधना है। पौषध में शुद्धता, जागरूकता व संयमशीलता रहनी चाहिए।
आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष पूर्णाहूति अवसर–
स्वामीजी की विशेषता पर दृष्टिपात– 
१. गोचरी और सादगी : आचार्य भिक्षु अंतिम अवस्था (सिरियारी चतुर्मास) में भी स्वयं गोचरी के लिए पधारते थे, जो उनके उच्च व्यक्तित्व को दर्शाता है।
२. कठोर मर्यादा और निर्णय :   साध्वियों के वस्त्र संबंधी मर्यादा का उल्लंघन होने पर उन्होंने कठोर निर्णय लेते हुए पाँचों साध्वियों का आहार-पानी का संबंध विच्छेद कर दिया था, यह उनके अनुशासन को दर्शाता है।
३. उत्तरदायित्व सौंपना : अपनी दूरदर्शिता से उन्होंने भारमल जी को युवाचार्य का पद सौंपा ताकि संघ व्यवस्था सुचारू रहे।