आचार्यश्री की देशना; पर्युषण पर्व में सामायिक, जप और स्वाध्याय में समय बिताने का दिया संदेश

लाडनूं। 25 अगस्त, 2026
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को ‘क्षमा से क्या मिलेगा?’ विषय पर अमृत देशना प्रदान की।
पर्युषण-संवत्सरी का आह्वान और निंदा का उत्तर :
१. पर्युषण पर्व की साधना : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि १० श्रमण धर्मों में उत्तम क्षमा एक धर्म है। ८ सितम्बर से पर्युषण पर्व प्रारंभ हो रहा है और १५ सितम्बर को भगवती संवत्सरी का आगमन है। इन आठ दिनों में गृहस्थ सामायिक, स्वाध्याय, जप, मौन, ध्यान, अनुप्रेक्षा और प्रतिक्रमण में अधिक से अधिक समय बिताएं। संवत्सरी पर सभी से खमतखामणा कर लेना चाहिए।
२. निंदा का उत्तर कर्मों से : यदि कोई नुकसान करे, अपशब्द बोले या निंदा करे तो सहन करें। निंदा का उत्तर जुबान या लेखनी से देने के बजाय हमेशा अपने अच्छे कार्यों से देना चाहिए। हमारी दिशा और गति ठीक हो तो आज निंदा करने वाला व्यक्ति भी कल प्रशंसा करने वाला बन सकता है।
क्षमा के ४ फल, बड़ों का विनय और विवाद निवारण :
१. भूल स्वीकारना और सहनशीलता : कोई गलती या कटु व्यवहार हो जाए तो सरल भाव से भूल स्वीकार कर पश्चाताप करें और खमतखामणा करें। क्षमावान व्यक्ति के मन में शांति रहने से बोलने वाला व्यक्ति भी उसी प्रकार शांत हो जाता है, जैसे सूखे मिट्टी वाले मैदान पर गिरी आग अपने आप बुझ जाती है।
२. सक्षमता में शांति और बड़ों का विनय : सामर्थ्य होने पर भी शांत रहना बड़प्पन है। साधु जीवन में छोटे साधु रत्नाधिकों का विनय करें। इसी प्रकार लौकिक जीवन में भी गृहस्थों को माता-पिता व बड़ों के सामने उद्दंडता नहीं करनी चाहिए। परिवार में संपत्ति या बंटवारे का प्रसंग आने पर कोर्ट-कचहरी जाने के बजाय आपस में बैठकर समाधान कर लेना चाहिए।
३. क्षमा से ४ महान उपलब्धियां: आगम के अनुसार खमतखामणा से बैर समाप्त होता है और जीव १. प्रसन्नता (प्रह्लाद भाव), २. सर्व जीव मैत्री, ३. भाव-विशोधि और ४. निर्भयता (अभय) प्राप्त कर लेता है।

युवाचार्य पद का एक मास : हो गुरुवर! महर करी...
पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी के निर्देशानुसार युवाचार्य श्री ने अपने हृदय के उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने पूज्य प्रवर को 'कल्पवृक्ष', 'चिंतामणि' और 'पारस' से भी उच्च स्थान देते हुए कहा कि गुरुदेव के पावन स्पर्श एवं अहैतुकी कृपा से एक साधारण शिष्य का जीवन भी निखरकर अलौकिक हो जाता है।
गुरुदेव का वात्सल्य इन लौकिक प्रतीकों से परे है। वे बिना मांगे ही अपने शिष्यों को आत्मिक संपदा से समृद्ध कर देते हैं।
युवाचार्य श्री ने अपने भाव पंक्तियों में प्रस्तुत किए:
हो गुरुवर ! महर करी,
मन पांच रतन दे मारी खोल भरी।
गुरुवर महर करी...
दीपक हूं प्रारंभ काल में, प्रभु भावना भाऊं रे,
कर तो जाऊं मैं विकास, सूरज बन जाऊं रे।
हो गुरुवर महर करी...
युवाचार्य दायित्व की स्वीकृति: 'सर्व सिद्ध त्रयोदशी' (आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी) के मंगल दिन पूज्य गुरुदेव द्वारा प्रदान किए गए दायित्व का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि गुरुदेव उनकी दिनचर्या, आहार-विहार एवं प्रत्येक निर्णय का स्वयं ध्यान रखते हैं, जिससे वे पूर्णतः निश्चिंत होकर साधना पथ पर अग्रसर हैं।
दीक्षा एवं प्रतिक्रमण के भावुक संस्मरण: जोधपुर में पहली बार प्रतिक्रमण का आदेश माँगने की घटना को याद करते हुए उन्होंने गुरुदेव की त्वरित स्वीकृति और दीक्षा के समय माता-पिता की भावना को सहज बनाने वाले गुरुदेव के संबल का भावुकता से उल्लेख किया।
गुरुदेव का वात्सल्य एवं संबल: एक संस्मरण साझा करते हुए उन्होंने बताया कि वाव में सेवाकाल के दौरान थकानवश झपकी आने पर भी गुरुदेव ने जगाने के बजाय स्नेहपूर्वक निर्देश दिया।
युवाचार्य श्री ने अंत में पुनः स्वीकार किया कि उनका संपूर्ण जीवन एवं साधना पूज्य गुरुदेव के अमूल्य मार्गदर्शन और असीम कृपा का ही प्रतिफल है।