समता से श्रमण होता है' विषय पर अमृत देशना—'पाप कर्म का उदय आए तो धन-दौलत भी त्राण नहीं दे सकती; समता, तप और स्वाध्याय ही आत्मा के सच्चे रक्षक

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, शांतिदूत, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मंगल प्रवचन में ‘समता से श्रमण होता है’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को आगम वाणी के माध्यम से पावन देशना प्रदान की। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि कर्म अत्यंत बलवान और निष्पक्ष होते हैं, जो किसी भी बड़े से बड़े व्यक्ति को भी नहीं छोड़ते।
कर्मवाद का अखंड सिद्धांत: न राजा बचे, न रंक–
१. निष्पक्ष है कर्म सत्ता : आचार्यश्री ने फरमाया कि आदमी जैसा पुण्य या पाप करता है, उसका फल उसे भुगतना ही पड़ता है। जब पाप कर्म का उदय आता है तो व्यक्ति को भयंकर कष्ट उठाने पड़ते हैं। उस समय धन, वैभव या सत्ता कोई त्राण (रक्षा) नहीं दे सकती।
२. अहर्निश जागरूकता : साधु हो या गृहस्थ, सभी को जागरूक रहना चाहिए कि कोई ऐसा निकृष्ट पाप कर्म न बंध जाए जो भविष्य में दुःखों 
का कारण बने। साधु जीवन में पांच महाव्रत, समिति और गुप्तियों में कोई दोष लगे तो तुरंत प्रायश्चित लेकर शुद्ध हो जाना चाहिए।
३. पुनर्जन्म और कर्म सिद्धांत : जैन दर्शन का मुख्य आधार कर्मवाद है, जिससे पुनर्जन्म का सिद्धांत जुड़ा हुआ है। चक्रवर्ती और बड़े धर्माधिकारियों को भी अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है।
जीवन दर्शन : समता से ही श्रमणता–
१. समता ही सुख की कुंजी : 'श्रमण कौन है?' का समाधान देते हुए पूज्य प्रवर ने कहा कि जो हर परिस्थिति में समता की साधना करता है, वही सच्चा श्रमण है।

२. शांत सहवास व स्वाध्याय : साधक चाहे बड़े समुदाय में रहे या एकांत में, समता, तप और सेवा बनी रहनी चाहिए।
३. ज्ञानी का परम कर्तव्य : जिसके पास ज्ञान है, वह उसे दूसरों को बांटे। ज्ञानी और शांतचित्त व्यक्ति जब अध्यापन में समय लगाता है तो समाज का भारी कल्याण होता है। प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने 'ॐ भिक्षु-जय भिक्षु' का जप भी कराया।
शासन श्री साध्वी सुप्रभा जी को दी गई भावांजलि–
मंगल प्रवचन के उपरांत आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में २३ जुलाई को देवलोकगमन हुईं शासन श्री साध्वीश्री सुप्रभाजी की स्मृति सभा आयोजित हुई।
आचार्यश्री का पाथेय–
पूज्य प्रवर ने साध्वीश्री जी का संक्षिप्त जीवन परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के आध्यात्मिक कल्याण की मंगल कामना की। इसके पश्चात् चतुर्विध धर्मसंघ ने चार 'लोगस्स' का ध्यान किया।
धर्मसंघीय व पारिवारिक अभिव्यक्तियां : मुख्यमुनिश्री महावीर कुमार जी, साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी, साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशा जी, शासन गौरव साध्वी राजीमती जी  आदि ने अपनी भावांजलि दी।