आचार्य श्री ने दी पावन प्रेरणा: देश में संविधान, कानून और नागरिकों में नैतिकता का पालन होना अनिवार्य

संपूर्ण राष्ट्र में ८०वें स्वतंत्रता दिवस के हर्षोल्लास के बीच, जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती परिसर में ‘स्वतंत्रता का महत्त्व’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान किया।
आत्मानुशासन : संयम और तप ही सच्चे साधन–
१. स्वानुशासन बनाम परानुशासन: पूज्य आचार्यश्री ने आगम का संदर्भ देते 
हुए फरमाया कि आत्मानुशासन का 
अर्थ है—स्वयं पर स्वयं का शासन। आचार्य तुलसी द्वारा प्रवर्तित अणुव्रत और प्रेक्षाध्यान दोनों ही स्वअनुशासन का मार्ग दिखाते हैं। यदि व्यक्ति में आत्मानुशासन मजबूत हो, तो बाहरी या सरकारी अनुशासन (परानुशासन) की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
२. संयम और तप का मार्ग : मनोनुशासन, वचनानुशासन और इंद्रियानुशासन की सामूहिक निष्पत्ति ही आत्मानुशासन है। अनशन और ऊनोदरी जैसे १२ प्रकार के तप और संयम के माध्यम से आत्मा को अनुशासित किया जा सकता है।
राष्ट्र के लिए संविधान 'रीढ़ की हड्डी'; लोकतंत्र के चारों स्तंभ करें श्रेष्ठ कार्य–
१. संविधान का महत्त्व : भारत के ऐतिहासिक स्वतंत्रता दिवस का उल्लेख करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि किसी भी राष्ट्र या संगठन के लिए संविधान रीढ़ की हड्डी की तरह होता है। परिस्थितियों के अनुसार संविधान में विधिक संशोधन भी अपेक्षित हो सकते हैं।
२. लोकतंत्र और प्रजा का सुख : चाहे राजतंत्र हो या लोकतंत्र, मुख्य लक्ष्य प्रजा का सुख, विकास और कोई भूखा न सोए—यही होना चाहिए। लोकतंत्र में कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और चौथा स्तंभ 'मीडिया'—जब ये चारों अपनी निष्ठा से कार्य करेंगे, तभी देश उन्नति करेगा।
३. नैतिकता और ईमानदारी : राष्ट्र की स्वतंत्रता में भी अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा जरूरी है। नागरिकों में परस्पर सद्भाव, अहिंसा और ईमानदारी का भाव रहना चाहिए।
आध्यात्मिक स्वतंत्रता और कर्मों का क्षय–
१. सबसे बड़ी स्वतंत्रता : पूज्य प्रवर ने फरमाया कि हमारी आत्मा मोहनीय आदि कर्मों की परतंत्रता में जकड़ी हुई है। संयम, संवर और तप (निर्जरा) के द्वारा आत्मा को आठों कर्मों के बंधनों से मुक्त कर देना ही अध्यात्म के क्षेत्र में उच्च कोटि की स्वतंत्रता है।
प्रतिनिधि सम्मेलन: युवाचार्य श्री का ओजस्वी उद्बोधन–
१. महासभा और सभाओं में विलक्षण स्नेह : तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन के दूसरे दिन युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने संभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि धर्मसंघ के विकास में आचार्यों के साथ श्रावक-श्राविकाओं का अतुलनीय योगदान रहा है। महासभा और क्षेत्रीय सभाओं के बीच मां की ममता जैसा विलक्षण स्नेह का धागा बंधा हुआ है। युवाचार्य श्री प्रतिनिधि सम्मेलन में PIC सूत्र का महत्व समझाया–
अ. संरक्षण (Preservation - P) : हमारे पास जो समृद्ध विरासत, संस्कार, परंपरा और गुरुओं का मार्गदर्शन है, उसे संभाल कर रखना हमारा कर्तव्य है। जिस प्रकार पुरानी पुस्तक को अलमारी में बंद रखने के बजाय पढ़कर ज्ञान आगे बढ़ाना जरूरी है, वैसे ही धर्म संघ 
के संस्कारों को भावी पीढ़ी तक पहुँचाना अनिवार्य है।
ब. एकीकरण (Integration - I) : धर्म संघ के कार्यकर्ता एक-दूसरे से जुड़े रहें। गुटबाजी संगठन को कमजोर करती है। परस्पर सद्भाव, प्रेम और विनम्रता के साथ कार्य करना ही एकता की पहचान है। हर व्यक्ति का श्रम धर्म संघ को शक्ति देने वाला होना चाहिए।
क. संवाद (Conversation - C): आपसी संवाद (बातचीत) संगठन की मजबूती के लिए बहुत जरूरी है। जहाँ संवाद नहीं होता, वहाँ दूरियां बढ़ जाती हैं और प्रेम कम हो जाता है। चाहे पद पर हो या न हो, हर कार्यकर्ता का संगठन में अपना महत्व है, इसलिए व्यक्तिगत संपर्क और सार-संभाल निरंतर बनी रहनी चाहिए।
२. लौकिक और लोकोत्तर गतिविधियां : युवाचार्य श्री ने कहा कि महासभा उपासक श्रेणी, ज्ञानशाला, सघन साधना शिविर 
जैसी लौकोत्तर गतिविधियों के साथ-साथ आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल जैसे लौकिक उपक्रमों से समाज को जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य कर रही है।