पूज्य प्रवर ने दी पावन प्रेरणा: 'अशुभ से हटकर शुभ योग में रहे मन'
लाडनूं। 27 अगस्त, 2026
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में अपने श्रीमुख से आगम की ज्ञान गंगा प्रवाहित कर चतुर्विध धर्मसंघ को आप्लावित कर रहे हैं। जैन विश्व भारती की सुधर्मा सभा में निर्धारित विषय ‘मन सुमन रहे’ पर पावन देशना प्रदान करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि आज अनुशासन पर्व यानी चतुर्दशी की हाजरी का पावन दिन है।
साधु आचार में तीन गुप्तियाँ और मन की चंचलता :
१. तीन गुप्तियाँ व मन संरक्षण : साधु की आचार व्यवस्था में तीन गुप्तियों का विधान है— मनोगुप्ति, वाग्गुप्ति और कायगुप्ति। मनोगुप्ति का अर्थ है मन का संरक्षण रखना और मन को दुष्ट प्रवृत्ति में जाने से बचाना।
२. हिंसा का संकल्प व पाप दोष : यदि मन में कोई हिंसा आदि का संकल्प जग जाता है, तो वह भी पाप का हेतु है, वह हिंसा करना है। यदि हिंसा करने के लिए कुछ प्रयास भी कर लिया, तो यह भी हिंसा का दोष हो जाता है।
३. राग-द्वेष और मन का आवेग : मन में विभिन्न प्रकार के राग-द्वेषात्मक भाव, छलना, आवेश, अहंकार व लोभ के रूप में उभर सकते हैं। मन की चंचलता के पीछे भीतर का भाव जागृत होता है, जिससे राग-द्वेषयुक्त चंचलता पैदा होती है।
आगम में मन के ४ प्रकार, सावद्य-निरवद्य विवेक और मनो गुप्ति :
१. मन के ४ प्रकार : आगमकार ने मन को चार प्रकार का बताया है— १. सत्य मन, २. मृषा मन (अयथार्थ/गलत), ३. सत्य-मृषा मन (मिश्रित) और ४. असत्य-मृषा मन (व्यावहारिक)। मन में यथार्थ बात भी आ सकती है और अयथार्थ यानी गलत बात भी आ सकती है।
२. सावद्य से निरवद्य का विवेक: साधक को यह ध्यान देना चाहिए कि मन में सावद्य (पापयुक्त) क्या है और निरवद्य (पापरहित) क्या है। यदि मन की प्रवृत्ति सावद्य हो रही है, तो उसे रोकने की चेष्टा करनी चाहिए ताकि हमारा मन निरवद्य प्रवृत्ति में रहे।
३. मन से पार जाने की साधना : मन से पार चले जाना बहुत बड़ी साधना हो सकती है। हमारा यह प्रयास रहे कि मन अशुभ न रहे, मन सुमन रहे और मन शुभ योग में रहे।
४. मन को वशीभूत बनाना : हमें मन के वशीभूत नहीं बनना है, बल्कि मन को अपने वश में बनाना है। सामान्यतया मन को हमारे वश में रखने का प्रयास करना ही मनो गुप्ति की साधना है।
मन की साधना अच्छी व सुचारू रहे, यह अभिकांक्ष्य है।
अनुशासन पर्व (हाजरी) और सामूहिक लेखपत्र उच्चारण:
१. चारित्रात्माओं को प्रेरणा : आज चतुर्दशी के संदर्भ में पूज्य आचार्यश्री
ने सभी चारित्रात्माओं को आचार-पालने व संयम संवर्धन हेतु विविध प्रेरणाएं प्रदान कीं।
२. लेखपत्र उच्चारण: पूज्य
आचार्य श्री की अनुज्ञा से बाल साध्वी पद्म प्रभा जी व साध्वी चंदन प्रभा जी ने सामूहिक लेखपत्र का उच्चारण किया।