लाडनूं में २००० से अधिक प्रतिनिधियों की मौजूदगी में त्रिदिवसीय 'तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन' का भव्य शुभारंभ
लाडनूं। 14 अगस्त, 2026
तेरापंथ की राजधानी के रूप में सुविख्यात जैन विश्व भारती परिसर में युगप्रधान, एकादशमाधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में 'संस्था शिरोमणि' जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन का मंगल शुभारंभ हुआ। इस विराट सम्मेलन में देश-विदेश के लगभग ६०६ क्षेत्रों से २००० से अधिक प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। सभी संभागियों ने पूज्य आचार्यश्री से मंगलपाठ श्रवण कर कार्यक्रम का आगाज किया।
'गर्हा से क्या मिलेगा?' — प्रतिक्रमण और आत्मा के शोधन का रहस्य–
१. स्वस्थान में लौटना ही प्रतिक्रमण : पूज्य आचार्यश्री ने उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से 'गर्हा से क्या मिलेगा?' विषय पर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि प्रमादवश स्वभाव से विभाव और आचार से अनाचार की ओर जाना ही स्वस्थान का अतिक्रमण है। वहां से पुनः अपने स्वभाव और साधना के स्वस्थान पर लौट आना ही प्रतिक्रमण है। चारित्रात्माओं के लिए रोजाना दोनों समय और गृहस्थों के लिए प्रतिदिन (या कम से कम पर्युषण पर्व में) प्रतिक्रमण और सामायिक करणीय है।
२. निंदा और गर्हा में अंतर : स्वयं अपने आप अपनी गलती स्वीकारना 'निंदा' है, जबकि दूसरों (गुरु या संघ) के सामने अपनी गलती को स्वीकार कर लेना 'गर्हा' कहलाता है।
३. अशुभ योगों से निवृत्ति : सबके सामने भूल स्वीकार करने से व्यक्ति का सामाजिक/सार्वजनिक अनादर (अपुरस्कार) भले ही हो, लेकिन वह अप्रशस्त व अशुभ योगों से मुक्त होकर शुभ योगों में स्थापित हो जाता है। इससे अनंत घाति कर्मों का क्षय होता है और आत्मा सदोष से निर्दोषता की ओर बढ़ती है।
'करें स्वयं का योगक्षेम' पुस्तक का भव्य लोकार्पण–
सुधर्मा सभा में पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी द्वारा रचित नवीन कृति ‘करें स्वयं का योगक्षेम’ का जैन विश्व भारती के पदाधिकारियों द्वारा पूज्य प्रवर के समक्ष भावभीना लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर आचार्यश्री ने पावन मंगल प्रेरणा प्रदान की। मुमुक्षु ख्याति ने भी अपने भक्तिभाव की अभिव्यक्ति दी।
महासभा 'संस्था शिरोमणि', दायित्वों के प्रति जागरूक:आचार्यश्री
१. मां और बेटे जैसा संबंध : प्रतिनिधि सम्मेलन के मंचीय कार्यक्रम में पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि जैसे मां और बेटा एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, वैसे ही महासभा और स्थानीय सभाएं आपस में जुड़ी हुई हैं।
२. शताधिक वर्ष पुरानी संस्था : महासभा १०० से अधिक वर्षों का गौरवशाली इतिहास रखती है। आचार्यश्री ने फरमाया कि महासभा अपने दायित्वों और समाज के प्रति कर्तव्यों के प्रति सदैव जागरूक दिखाई देती है, इसीलिए इसे 'संस्था शिरोमणि' का दर्जा दिया गया है।
३.धार्मिक-आध्यात्मिक उन्नति का आह्वान: आचार्यश्री ने ज्ञानशाला, उपासक श्रेणी, सेवा साधक श्रेणी आदि आयामों का उल्लेख करते हुए प्रतिनिधियों को देव, गुरु और धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा बनाए रखने का पावन पाथेय दिया।
प्रतिनिधि सम्मेलन में युवाचार्य श्री की वर्धापना–
कार्यक्रम के दौरान महासभा के प्रबंध न्यासी सुरेश चंद गोयल और अध्यक्ष महेंद्र नाहटा ने अपने विचार व्यक्त किए। पदाधिकारियों एवं देश-विदेश से आए प्रतिनिधियों ने नव-मनोनीत युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी की भावभीनी वर्धापना की। कार्यक्रम का कुशल संचालन महासभा के महामंत्री विनोद बैद ने किया।