ज्ञान के साथ जब निडरता जुड़ती है... तभी समाज में नए युग का जन्म होता है। –आचार्यश्री महाश्रमण

आद्य अनुशास्ता महामना आचार्यश्री भिक्षु के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के अंतर्गत ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के चतुर्थ चरण एवं तीन दिवसीय समापन समारोह का गरिमामय शुभारंभ लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती की सुधर्मा सभा में हुआ। अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में कार्यक्रम का प्रारंभ महामंत्रोच्चार से हुआ। मुनिवृंद ने 'भिक्षु अष्टकम्' तथा साध्वीवृंद ने 'प्रज्ञा गीत' का संगान किया।
आचार्य भिक्षु का अनूठा ज्ञान वैभव और प्रखर प्रतिभा–
१. आगम स्वाध्याय से सिद्धांत निर्माण : पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने ‘आचार्य भिक्षु का ज्ञान वैभव’ विषय पर अमृत देशना देते हुए कहा कि आगम पढ़ना एक बात है, परंतु गहराई में उतरकर आगम वाणी के प्रति अटूट श्रद्धा रखना विशेष बात है। स्वामी भिक्षु ने सिद्धांतों और साध्वाचार के सभी निष्कर्ष आगमों का गहन अध्ययन करके ही निकाले।
२. ३८,००० गाथाओं का विराट साहित्य : आचार्य भिक्षु में ज्ञानावरणीय कर्म का अद्भुत क्षयोपशम था। उनके द्वारा रचित ३८,००० गाथा प्रमाण साहित्य उनकी तीक्ष्ण बुद्धि, प्रतिभा और विराट प्रज्ञा का स्पष्ट प्रमाण है।
३. अनोखी दृष्टान्त शैली व निडरता : स्वामी भिक्षु की सबसे बड़ी विशेषता थी उनकी दृष्टान्त (उदाहरण) शैली, जिससे वे कठिन से कठिन आध्यात्मिक बात को भी श्रोता के गले आसानी से उतार देते थे। ज्ञान वैभव के साथ-साथ उनमें अद्भुत निडरता थी; वे अपनी बात को निर्भीकता और स्पष्टता से रखते थे।
कंटालिया प्रवास और जयाचार्य का साहित्य–
१. भिक्षु चेतना वर्ष की यात्रा : पूज्य प्रवर ने एक वर्ष पूर्व शुरू हुए चेतना वर्ष का स्मरण कराते हुए बताया कि स्वामी भिक्षु की जन्मस्थली 'कंटालिया' में १३ रात्रियों का प्रवास और महाचरण का ऐतिहासिक आयोजन संपन्न हुआ था।
२. भिक्षु जस रसायण : धर्मसंघ के आद्य प्रवर्तक स्वामी भिक्षु का प्रभाव जयाचार्य रचित 'भिक्षु जस रसायण' में स्पष्ट झलकता है। आचार्यश्री ने सभी साधु-साध्वियों को स्वामी भिक्षु के साहित्य का गहन अध्ययन करने की प्रेरणा दी।
श्रद्धांजलियों व गीतों से गुंजायमान हुई सुधर्मा सभा– 
साध्वीवर्या जी का वक्तव्य : साध्वीवर्या श्री सम्बुद्धयशा जी ने स्वामी भिक्षु को यशस्वी, वर्चस्वी और तेजस्वी महापुरुष बताते हुए कहा कि उनके जीवन में संयम-साधना के साथ ज्ञान 
के क्षयोपशम और पुरुषार्थ का अद्भुत संगम था।