लाडनूं में 'सामायिक से क्या मिलेगा?' विषय पर पूज्य प्रवर का मार्मिक बोध; तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन का हुआ भावपूर्ण समापन

लाडनूं। 16 अगस्त, 2026
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने रविवार को लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती के मुख्य प्रवचन पांडाल में ‘सामायिक से क्या मिलेगा?’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान किया।
सामायिक के प्रकार और सावद्य योग से विरति–
१. सामायिक के तीन भेद : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि सामायिक शब्द जैन साधना पद्धति में अत्यंत प्रसिद्ध है। सामायिक के मुख्य तीन प्रकार हैं—सम्यक्त्व सामायिक (तत्त्व श्रद्धा), श्रुत सामायिक (तत्त्व ज्ञान) और चारित्र सामायिक (आचरण)।
२. देश विरति बनाम सर्व विरति : आचरण रूप चारित्र सामायिक के दो भेद हैं—श्रावक के लिए अंशकालिक 'देश विरति सामायिक' (नौवां व्रत) और साधु के लिए आजीवन 'सर्व विरति सामायिक'।
३. पाप प्रवृत्तियों का त्याग : सामायिक का सबसे बड़ा लाभ सावद्य योग विरति (पापयुक्त मन, वचन, काय की प्रवृत्तियों से मुक्ति) है। श्रावक एक मुहूर्त (४८ मिनट) के लिए सावद्य योग का त्याग करता है, जबकि साधु जीवनभर के लिए तीन करण, तीन योग से पापों का प्रत्याख्यान करता है।
साधुचर्या और अनुशास्ता का उत्तरदायित्व– 
१. क्रोध और अहंकार का वर्जन : सर्व विरति धारण करने वाले साधु के लिए क्रोध, अहंकार, छल-कपट और लोभ जैसे अशुभ योग वर्जित हैं। साधु को हास्य-विनोद या निरर्थक बातों में अपनी शक्ति नष्ट नहीं करनी चाहिए।
२. क्षमा ही सच्चा गुण : आचार्यश्री ने फरमाया कि यदि कोई छोटा साधु बड़े साधु को कुछ बोल भी दे, तो भी शक्ति होने के बावजूद क्षमा धारण करना ही सच्चा बड़प्पन है। गुणों से ही गुरु बड़ा होता है।
३. अनुशास्ता की सहनशक्ति : संघ के प्रमुख या अनुशास्ता के सामने विविध परिस्थितियां आ सकती हैं, अतः नेतृत्व करने वाले में अगाध सहनशक्ति होनी आवश्यक है। शक्ति का प्रयोग ज्ञान, प्रवचन और दूसरों को संयमी बनाने में होना चाहिए।
प्रतिनिधि सम्मेलन का समापन–
महासभा और सभाओं को निर्देश
सेवा और सजगता का आह्वान–
त्रिदिवसीय तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन के समापन अवसर पर आचार्यश्री ने महासभा व क्षेत्रीय सभाओं के प्रतिनिधियों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि सभी अपने-अपने क्षेत्रों में धार्मिक-आध्यात्मिक चेतना बनाए रखें और विराजमान साधु-साध्वियों की भावभरी सेवा करते रहें।
साध्वीप्रमुखा व साध्वीवर्या जी के भावपूर्ण उद्बोधन–
1. व्यक्तित्व निर्माण की संस्था : साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने फरमाया कि महासभा धर्मसंघ के व्यक्तित्व निर्माण की मुख्य संस्था है। ज्ञानशाला के जरिए बच्चों का भविष्य उज्ज्वल करने के साथ-साथ सघन साधना शिविर व सेवा-साधक जैसे उपक्रमों से समाज को सशक्त बनाया जा रहा है।
2. वटवृक्ष की भांति छाया देती महासभा : साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशा जी ने प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए कहा कि आचार्य प्रवर द्वारा 'संस्था शिरोमणि' और 'मां' की उपाधि प्राप्त महासभा वटवृक्ष की भांति पूरे धर्मसंघ को छाया प्रदान कर रही है।